Saturday, November 18, 2017
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कानाबाती -कानाबाती- कुर्रर्ररररर

शायरी

रूखी सी मेरी आंख जिस दिन भी नम होगी
खारी सी उसी स्याही से खूबसूरत सी गज़ल होगी

खुद को समझी न थी तुमको कया सफाई देती
ये रिश्ता कोई रिश्ता न था किस नाते दुहाई देती

आज जो तेरा दौर है उसमें मेरा भी हिस्सा है
कैसे मैं बन गई सीढ़ी इसका भी एक किस्सा है।

जिन्दगी के इस सांप सीढ़ी खेल में
मेरे हिस्से में आए सांप
तेरे हिस्से में सारी सीढ़ीयां
मेरी किस्सागोई के अहम किरदार हो तुम
गर छप गईं तो याद रखेंगी तुम्हारी पीढ़ीया –