Friday, September 22, 2017
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कानाबाती -कानाबाती- कुर्रर्ररररर

ये व्यवस्था उन्हीं को बदल देती है

उन्हे देर से समझ आ पाती है कि कैसे ये सब हो गया ,कम से कम भाषणों से सत्ता मिल तो जाती है पर व्यवस्था नहीं बदलती ,सत्ता के मखमली अहसास के आन्नद में उदेश्य तो घास चरने चला जाता है। इसके लिए तो बनी बनाई सत्ता त्याग करने वाला जिगरा चाहिए- कठोर राजनैतिक ईच्छा से व्यवस्था बदल देने वाले फैसले लेने और लागू करने में एकबारगी सत्ता जरूर चली जाएगी पर दूरगामी परिणाम देश हित में ही फलित होगें । जो इस व्यवस्था के लाभ लेने मे माहिर हैं वे अपनी दुकानदारी सस्ते में थोड़े न जाने देगें – हां बदलने की बात करने वालों को मोटा हिस्सेदार बना कर स्वाद चखा कर एक दिन ठिकाने लगा देंगे । अब तक तो यही होता आया है बन्धु ।