Monday, June 25, 2018
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कानाबाती -कानाबाती- कुर्रर्ररररर

आज से बीस पच्चीस साल पहले

आज से बीस पच्चीस साल पहले तक केवल दो प्रकर की महिलाऐं ही कामकाजी जीवन शैली अपना रही थी – एक तो वे जो बहुत ज़रूरतमंद थी और परिवार कि आजीविका उनके सिर पर थी और दूसरी वें जो जागरूक थी और अपना जीवन अपने ढ़गं से, अपनी शर्तो पर ,व अपनी पहचान के साथ जीना चहती थी दोनो ही अवस्थाओं मे वे परम्परावादी समाज को खटकती थी ,उनके लिए हीनता भरा दृष्टिकोण था व उन्हें सम्बोधित करने के लिए अभ्द्र शब्दावली का उपयोग होता था हरियाणवी समाज का पेटेंट वाक्य था और कहीं आज भी मुखर है – यें फिरैं रान्ड बद्धी होई । मेरी लुगाई और छोरी जे न्यूँ फिरैं तो काट कै धरती मैं गाड दयूँ। ——–गालीयां देने वालो की आवाज ऊंची ,आखें लाल ,कान खड़े, दुम ऊंची ———– तो मैने भी देखी सुनी
वक्त कितना बदल गया आज वही टिप्पणी करता अपनी बहु ,बेटीयों की परची लिए मेरे पास चले आते हैं – जी बहु के ईन्टरव्यू का रोल लम्बर लिकड़ रह्या जी, आप तो बाहर भीतर फिरो हो
जी ,आप नै तो सारा ज्ञान है जी,,किमे थोड़ी घणी सिफारिस लगवा दयो जी,सरकारी मैं लम्बर पड़ ग्या जे -इनका सुथरा टैम कट जैगा।
और मैं कभी उनकी ढीली आवाज ,कभी लटके हुए कान ,कभी लुप्त हुई दुम को देखती हूं कभी अपने घर को देखती हूं और उनके साथ आई bob cut hair ,without sleeves t shirt ,jeans ,high heels पहने बहु पर से तो मेरी नजरें हट ही नही रहीं हैं