Tuesday, May 22, 2018
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कानाबाती -कानाबाती- कुर्रर्ररररर

सफर में मैं हूं या सफर मुझ में हैं

सफर में मैं हूं या सफर मुझ में हैं
लगता है दोनो ही रफतार में हैं

न मन्जिल का पता न ही सारथी है कोई
जाने कैसे पहुचीं- इस बेसुध सी कतार में हूं

कोइ मन्दिर कोइ मस्जिद का पता देता है
मैं तो एक रौशनी के बुखार में हूं

शेष फिर कभी

-सुनीता धारीवाल