Saturday, November 18, 2017
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कानाबाती -कानाबाती- कुर्रर्ररररर

Monthly Archives: October 2013

प्रिय शिफाली

dedicated to my beautiful niece shefali तुम हो खुशियों की दीवाली तुम खुशबू हो मेरी रूह मे महकती हो तुम हंसती हो जैसे मेरे आंगन मे किरन सी चमकती हो तुम्हारी उपस्थिती से तुम्हारी जननी को अपने पास पाती हू मैं तुम्हे शायद तुम से ज्यादा जान पाती हूं मैं तुम्हारे मूक क्रन्दन की कंपन सुन लेती हू मैं तुम्हारे ... Read More »

तुम को एक बार और पा लूं

तेरी यादों का मेरी रूह में असीम सिलसिला सा है कुछ मे मुझे तुझ से और कुछ में तुझे मुझ से मिला है जैसे दम निकलता हो ह़ड्डियों मे जैसे तपता अंगार निकलता हो दिल मे जैसे खून नही चीत्कार सरकता हो आंखो मे जैसे आंसू नही लावा सा दरकता हो मन के रूदन और चीत्कार से तन मे हाहाकार ... Read More »

तिनका तिनका हमसफर

शीर्षक – तिनका हमसफर सर्घंषों के अथाह सागर मे मुझकों तो बस तिनके की दरकार थी तैरते थकते मैने देखे थे ता है… कितने तिनके बदहवास उनको बल समझाने मे मेरे सब बल निकल गऐ फिर भी मेरा हठ तो नापिए तिनके को बना हमसफऱ जूझने लगी थी मैं मुझ से सौ कद ऊंचे ज्वार भाटा के प्रचंड आवेगों से ... Read More »

दुस्साहस

मेरी चुप का कितना महिमा मन्डन है इस गैर जरूरी बचकाने से महिमा मंडन का मेरी ओर से खन्डन है पर मै तो बोलती हूं सब नारियों की जुबान बनकर अब तो लिखती भी रहती हूं सभी अबलाओं के बयान बन कर मुझे तो स्वीकार है मेरे निसंकोच बोलने पर मिले सभी विशेषण बेशरम -बेहया -निल्लर्ज बुरी औरत-गंदी औरत चरित्रहीन-,चंचला-उन्छृखल ... Read More »

रन फार फन

रन फार फन बार बार उठी मैं फिर से जा टकराई समाज से परम्पराओं से रूढियो से स्थापित पूर्वाग्रहो से विपरीत परिवेश से कभी व्यवस्था से कभी आस्था से कभी तुम्हारे दम्भ से कभी तुम्हारे देह से तुम्हारी सोच से तुम्हारी नोच से अक्सर चोटिल हुई अक्सर लहुलुहान हुई हर बार न जाने कैसे फिर से उठ खड़ी हुई मेरे ... Read More »

आजादी

आजादी की लहर पर सवार कब छूट गऐ अपने कब उतर गऐ कपड़े कब बिखऱ गया घऱ कब आत्मा हुई लहुलुहान कब दिल हुआ छलनी पता ही न चला सिंसकिया थी पहले गुलामी की पैरो कार ऐसी आजादी मे केवल और केवल चीत्कार इस लहर पर सवार सब लुट गया सरे बाजार माया की जूतम पैजार काया ही सब संसार ... Read More »

दुनिया की निगाह में

तेरे दम्भ की दीवार मुझसे लांघी नही जाती पर मेरी सोच उस पार जाती है बेखौफ बिना रूकावट तुम कभी न सुन पाओगे मेरे साहस की मूक मुनादी यह क्या मेरी हार से खुश हो तुम पर मैं कहां हारती हूं मै तो रोज जीतती हू तुम्हारी रचाई बाधा दौड़ अपने चिन्तन में और भी दक्ष हो जाती हूं उड़ने ... Read More »

बिटिया

जब से बिटिया हुई जवान आईने खिलौने बन गए है अब नही निकलती कोई गुड़िया उसके झोले से , काजल, लाईनर, नेल पेंट, लिप ग्लास से भरा पड़ा उसका झोला अब नही अटकती उसकी नजर किसी ठेले वाले पर किसी गुब्बारे वाले पर अब तो उसकी नजर बार-बार खुद पर ही जाती है । या अटक जाती है उन नजरों ... Read More »