Saturday, November 18, 2017
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कानाबाती -कानाबाती- कुर्रर्ररररर

Category Archives: कविता

शायरी

रूखी सी मेरी आंख जिस दिन भी नम होगी खारी सी उसी स्याही से खूबसूरत सी गज़ल होगी खुद को समझी न थी तुमको कया सफाई देती ये रिश्ता कोई रिश्ता न था किस नाते दुहाई देती आज जो तेरा दौर है उसमें मेरा भी हिस्सा है कैसे मैं बन गई सीढ़ी इसका भी एक किस्सा है। जिन्दगी के इस ... Read More »

जिन्दगी की साँझ कया सच में बाँझ है

जिन्दगी की साँझ कया सच में बाँझ है खुशफहम सवेरा था मां पिता के लाड में जो कुछ भी जग में था सब मेरा मेरा था दोपहर कड़कती में मेहनत की ठन्ठक थी जो कुछ भी था पाया सब तेरा तेरा था कभी सांझ कौतुहल थी फिर सुरमई लगती थी अब सांझ हकीकत है फिर बांझ कयूं लगती है कयों ... Read More »

अच्छे बच्चे रोते कयूं सुन्दर आंखें खोते कयूं

अच्छे बच्चे रोते कयूं सुन्दर आंखें खोते कयूं वो देखो तुम कुतुब मीनार वो देखो दिल्ली का बाजार संसद के खम्बों की कतार नोटों से बनती सरकार देखो भूखी जनता और तिरस्कार आदिवासियों के स्वचालित हथियार वो देखो जिस्मों के व्यापार घर घर में घुसता व्याभिचार देखो दिल्ली में सजता दरबार छुटभैय्यों की देखो भरमार खत्म करेंगे भ्रष्टाचार कैसे कैसे ... Read More »

मन्जिलों को पाटती दुनीया

मन्जिलों को पाटती दुनीया और बेमकसद सी ठहरी मैं सपने तो केवल सपने थे उन में भी उतरी गहरी मैं झूठ बहाये अपनो नें कितने सुन कर भी बनती बहरी मैं सँस्कार देहाती छूट न पाऐ फिर भी कहलाती शहरी मैं सान्झ सुबह कोई और ही होंगी हर दम तपती दुपहरी मैं Read More »

सफर में मैं हूं या सफर मुझ में हैं

सफर में मैं हूं या सफर मुझ में हैं लगता है दोनो ही रफतार में हैं न मन्जिल का पता न ही सारथी है कोई जाने कैसे पहुचीं- इस बेसुध सी कतार में हूं कोइ मन्दिर कोइ मस्जिद का पता देता है मैं तो एक रौशनी के बुखार में हूं शेष फिर कभी -सुनीता धारीवाल Read More »

सारा आलम धुला धुला सा है

सारा आलम धुला धुला सा है आह ठन्ठी में पानी बरसा है धूल की महीन सी परते थी उनकी भी अपनी शर्ते थी कि तुम आओ तो संग चलूं घुल जाऊं मैं जब तुम से मिलूं अब आए हो तो सर आखों पर देखो मैं मिटती जाती हूं तुम पत्तो पर गिरते जाते हो मैं संग सरकती जाती हूं सब ... Read More »

मां मत छोड़ना मुझे-

मां तुम कहां हो मां-मुझे बहुत डर लग रह है वो मुझे घूर रहा है उसकी आखें एकदम लाल हैं वह बस मुझे ही देख रहा है मां तुम कहां हो मां-मुझे बहुत डर लग रह है वह बार बार ईधर उधर देख रहा है फिर फिर से मुझे ही देख रहा है मां तुम कहां हो मां-मुझे बहुत डर ... Read More »

सबला

जब हो मझदार में नैय्या घिर आऐ घोर अंधियारा और आस का छिप जाऐ सूरज दिखता न हो दूर किनारा तभी डोलती नाव से ऐक सहमी सी आवाज आती है डरो मत मैं किनारो का पता जानती हूं और उठ खड़ी होती है बुलन्द हो नाव का चप्पू ले तूफानो से नजर मिलाती है और किनारो से आलिगंन करती है ... Read More »

एक बड़ा सा काला शून्य

इस माटी देहात्मा में मिल गऐ है कितने ही पश्चाताप के आत्मग्लानि के मोक विकार के स्वधिक्कार के असीम असुरक्षा के कितने ही अवयव घुल गए हैं मेरे निरन्तर बहते खारे आंसुओं से बना लिया है दलदल इस घुलमिल मित्रता में जहां मेरे प्राण फंसे है अनचाहे से देहात्मा से कसे है जितना भी निकलना चाहूं उतना गहरे और धंसे ... Read More »

हर इक दिन मौका तलाश करता हूं

हर इक दिन मौका तलाश करता हूं खुद से भागूं और तुझे ढून्ढ लाऊं मै प्रियवर न खुद से भाग पाओगे न मुझ को ढून्ढ पाओगे खुद में ही ढून्ढ लो वरना मौका भी गंवां जाओगे रूह में रहती हूं तुम्हारी वहीं मुझे पा जाओगे खुद से ही गर भागे तो मैं भी छूट जाऊगीं तेरी रूह बसेरा मेरा है ... Read More »